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मन्त्र एक – अर्थ अनेक l Vaidic Physics l Acharya Agnivrat

मन्त्र एक – अर्थ अनेक l Vaidic Physics l Acharya Agnivrat

ओम विश्वा देव सवित दुरिता परासुव य भद्रा तन आसुव प्रोताग आज से हम वेद पर एक श्रंखला प्रारंभ करते हैं। जिसमें कुछ मंत्र जो हमने निरुक्त के भाष में दिए हैं उन पर विचार करेंगे। बहुत सरल शब्दों में निरुक्त का भाष्य वेदार्थ विज्ञानम नाम से हमने प्रकाशित किया है और यह संसार में पहला भाष्य है जो सबसे विस्तृत है, वैज्ञानिक है और संपूर्ण है। इसके अतिरिक्त हमारी जानकारी में विश्व में कोई भाषा ऐसा नहीं है जो वैज्ञानिक भी हो, संपूर्ण भी हो और इतना विस्तृत भी हो। तो उसमें हमने वेद मंत्रों की जो व्याख्या की है उनमें से कुछ मंत्रों को हम क्रमश प्रस्तुत करेंगे और उसको सरल करके प्रस्तुत करेंगे ताकि सभी श्रोताओं को समझ में आ सके। प्राय यह शिकायत रहती है कि हमारे ग्रंथ बहुत कठिन है। इसलिए हम इसको मंत्रों के भाष्य को सरल रूप में प्रस्तुत करेंगे। कुछ लोग यह कहते हैं के किसी भी मंत्र का केवल एक ही प्रकार का अर्थ हो सकता है। वे वास्तव में वेद के तत्व को बिल्कुल नहीं जानते। हम यह बताएंगे हम बताते रहे कि प्रत्येक वेद मंत्र के कम से कम तीन प्रकार के भाष हो सकते हैं।

पहला आदि दैविक भाष्य जिसको वैज्ञानिक कह सकते हैं। दूसरा आदि भौतिक भाष्य जिसको व्यवहारिक कह सकते हैं। और तीसरा आध्यात्मिक भाष्य और आदि भौतिक आध्यात्मिक आदि दैविक ये तीनों भी इनमें भी कई प्रकार के भाष्य हो सकते हैं। तो आज हमने एक बहुत सरल मंत्र को लिया जो पहले बोला विश्वान देव सवित दूर परास य भद्र तस यह मंत्र ऋषि दयानंद सरस्वती को बहुत प्रिय था। उन्होंने अपने वेद भाष्य में अध्या यजुर्वेद भाष्य में अध्याय आरंभ करने से पहले इस मंत्र को दिया है। प्रत्येक अध्याय के प्रारंभ में तो इसी मंत्र को हम आज ले रहे हैं जो ऋषि दयानंद को सबसे प्रिय था।

वैसे वेद चारों वेदों के मंत्रों में किसी दूसरा आदि भौतिक भाष्य जिसको व्यवहारिक कह सकते हैं। और तीसरा आध्यात्मिक भाष्य और आदि भौतिक आध्यात्मिक आदि दैविक ये तीनों भी इनमें भी कई प्रकार के भाष्य हो सकते हैं। तो आज हमने एक बहुत सरल मंत्र को लिया जो पहले बोला विश्वान देव सवित दूर परास य भद्र तस यह मंत्र ऋषि दयानंद सरस्वती को बहुत प्रिय था। उन्होंने अपने वेद भाष्य में अध्या यजुर्वेद भाष्य में अध्याय आरंभ करने से पहले इस मंत्र को दिया है। प्रत्येक अध्याय के प्रारंभ में तो इसी मंत्र को हम आज ले रहे हैं जो ऋषि दयानंद को सबसे प्रिय था। वैसे वेद चारों वेदों के मंत्रों में किसी को हम यह नहीं कह सकते यह कम महत्वपूर्ण है अधिक महत्वपूर्ण ऐसा नहीं है लेकिन इसलिए हम इसको ले रहे हैं क्योंकि यह मंत्र सरल भी है और ऋषिंद को प्रिय भी था तो हम इस प्रकार इसके 16 प्रकार के में हमने भाष्य किया है अपने निरुक्त के भाष्य में वेदार्थ विज्ञान में इसका भाष्य 16 प्रकार का है जिसमें दो प्रकार का आध्यात्मिक भाष्य पांच प्रकार का आदि भौतिक भाष्य और नौ प्रकार का आदि दैविक भाष्य एक ऋषि आनंद का भी उित किया है 17 प्रकार हो गए तो सबसे पहले हम सरल से प्रारंभ करते हैं।

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