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धार्मिक साहित्य पढ़ना भी जरुरी | ठाकुर विक्रम सिंह | Arya Sandesh TV | Sanatan Dharm | Speech

धार्मिक साहित्य पढ़ना भी जरुरी | ठाकुर विक्रम सिंह | Arya Sandesh TV | Sanatan Dharm | Speech

आर्य समाज और महर्षि दयानंद के सिद्धांतों को समझने का सु अवसर मिलता है। और विशेषकर जैसा हम सबको पता है कि आज हमारी शिक्षा क्या है? इसलिए मैं सभी बच्चियों से सब बच्चों से निवेदन करता हूं। भाई कोर्स की किताबें तो पढ़ो और मेहनत करो। लेकिन अपने धर्म का साहित्य जो है वह पढ़ना चाहिए और उसके बारे में पूछना चाहिए। देखिए इस संसार में बहुत महापुरुष हुए आ रहे हैं और जा रहे हैं। लेकिन महर्षि दयानंद जिस समय में उनका प्रादुर्भाव हुआ भारत गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था। और सबसे पहले क्रांति कहां से हुई? मेरठ से क्रांति हुई। तो मैं मेरठ के क्षेत्र से आता हूं। इसलिए वह मेरे ऊपर संस्कार आज भी है।

क्यों? आचार्य दीपांकर कम्युनिस्ट विधायक थे। उन्होंने मेरठ का इतिहास पुस्तक लिखी। और उसमें लिखते हैं कि 1857 की जो क्रांति हुई उसमें सबसे महत्वपूर्ण भूमिका किस व्यक्ति की थी? तो वह लिखते हैं बाबा ओगढ़नाथ के मंदिर में जो छावनी के बीच में उसमें एक साधु रहते थे और सैनिकों को पानी पिलाते थे। आजकल तो समय बदल गया। पानी पिलाने का पुण्य भी बहुत ज्यादा था। पानी पिलाते थे और क्या पूछते थे क्या नाम है? मेरा नाम मोहन। मोहन तुम्हें पता होना चाहिए जो अंग्रेज सरकार कारतूस दे रही !.

है। इसमें गाय की चर्बी लगी। बस इतना सुनते दिमाग झनझना जाता है। दूसरा व्यक्ति आया पानी पिलाया। क्या नाम है? अब्दुल। इस पर सूअर की चर्बी लगी। यह तो हमारा सबका धर्म भ्रष्ट कर रहे हैं। इसलिए हिंदू और मुसलमान सब ने मिलकर संघर्ष किया और 1857 की क्रांति के बीच जो बोए गए आजादी के उसमें महर्षि दयानंद का सबसे ज्यादा योगदान था। तो वो कहते ये स्वामी दयानंद थे साधु के रूप में और कोई दूसरा व्यक्ति नहीं था। तो इसलिए मैं बच्चों को यह संस्कार कोई देता ही नहीं कि देश आजाद कैसे हुआ। आप कैसे आजकल यहां पर हो? आपकी शिक्षा संस्कृति कैसे बची हुई

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