सरस जीवन, क्रियाशीलता का मूल मंत्र – आचार्य वागीश | Arya Sandesh TV | Arya Samaj | Swami Dayanand
जनवरी के महीने में जो अभी सन 25 में आएगा उसमें ब्रिटेन का एक बैंड एक ऑर्केस्ट्रा भारत आ रहा है। वह अपने संगीत का कंसर्ट मुंबई में करेंगे। तो उनको लाइव सुनने के लिए [संगीत] ₹1 लाख से टिकट शुरू हुई और 10 लाख तक पहुंची और वेबसाइट क्रैश हो गई जो वेबसाइट पर बुकिंग चल रही थी तो इतनी इतनी डिमांड थी कि साइट क्रैश हो गई तो कहा जाता है कि लगभग सारे टिकट बिक चुके हैं और 1 करोड़ वेटिंग चल रही है।
शायद कोई कैंसिल कराएगा तो उसकी जगह उनको टिकट मिल जाएगा और ब्लैक में भी टिकट उपलब्ध है। 10 लाख से ज्यादा खर्च करने पड़ेंगे। 101 में आप अपने मोबाइल पर डाउनलोड करके उनका जो भी कुछ संगीत के नाम पर शोर है वह आप सुन सकते हो। बड़ी मुश्किल में पूरी मनुष्यता फंस गई है या फंसा दी गई है। पूरी पूरी मनुष्यता का जो सबकॉन्शियस माइंड है वो इस तरह से चेंज कर दिया गया है। उसका उसकी डिजाइन ऐसी बना दी गई है और बनाई जा रही है कि न जाने किन-किन चीजों में मनुष्य सुख ढूंढ रहा है।
मुझे नहीं लगता कि आप कभी आर्य समाज में ₹100 का भी टिकट लगा दें भाषण सुनने के लिए तो आपका हॉल भर जाएगा। आप पूरा वेस्टर्न म्यूजिक सुने जिसको पॉप और रैप म्यूजिक कहा जाता है। उसको सुन के अगर आप बहुत दिनों तक सुनते रहे तो आप बहरे हो जाएंगे और आपके मस्तिष्क के बहुत सारे सेल्स नष्ट हो जाएंगे क्योंकि कोई भी जरूरत से ज्यादा ऊंची आवाज आपके ब्रेन में कुछ ना कुछ डैमेज करती है। किसी प्राचीन कवि का यह कहना है कि जिस संगीत को सुनने से एक साल के बच्चे का भी सिर ना झूम जाए वह संगीत नहीं है। इस बात को दूसरे तरीके से रविशंकर कहा करते थे।
श्री श्री नहीं डबल श्री नहीं वह जो बड़े बड़े म्यूजिशियन थे सितार वादक थे। वह कहते थे जब आप भारत का क्लासिकल म्यूजिक सुनते हैं तो आपका सिर झूमता है। और जब आप वेस्टर्न म्यूजिक सुनते हैं तो आपके पैर थिरकते हैं या कमर सिर नहीं झूमेगा। पैर थिरकेंगे या कमर थिरकेगी। इससे प्रूव होता है कि उस म्यूजिक का सिर से मस्तिष्क से कोई रिश्ता नहीं है। संगीत का उपयोग क्या है? हमारे प्राचीन नीतिकारों ने कहा है कि जिस व्यक्ति के जीवन में साहित्य, संगीत, कला इनमें से कुछ भी नहीं है, वह व्यक्ति मनुष्य शरीर में पशु का जीवन जी रहा है। केवल सींग और पूछ की कमी रह गई है। साहित्य संगीत कला विहीन साक्षात पशु पुच्छ विषाण हीन संगीत हो या कोई भी कला हो जीवन में रस का समावेश करती है। जीवन उसके द्वारा सरस बनता है।
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