देश पहला राजा कब और कौन बना?? मनुस्मृति का विरोध क्यों… BY Acharya Harishankar Agnihotri Ji
उत्तर वैदिक काल कब शुरू हुआ? जब राजा बनाया गया। अच्छा जब ठीक चल रहा था तो राजा की क्या जरूरत थी? अरे जब सब ठीक ही चल रहा था तो राजा की क्या जरूरत है? तो सुनो राजा की जरूरत उस समय पड़ी जब कुछ लोगों ने अवैध वातावरण बनाया। कुछ लोगों ने वेद से अलग हट कर चले। अच्छा वेद से अलग हट कर चलेगा तो बदतमीजी करेगा कि नहीं? बोलो। उसने बदतमीजी की। जो परेशान हुए उन लोगों ने जाकर किससे गुहार लगाएं? राजा है नहीं।
किससे कहे हम परेशान हैं। तो उन्होंने जाकर आचार्य से कहा। तो आचार्य ने देखा समझा बात को। उन्होंने कहा भाई दंड तुम्हें भी नहीं दे सकता। दंड का अधिकारी कौन-कौन होता है? दंड का अधिकारी सबसे पहले माता-पिता होते हैं। और वो भी अपनी एक अवस्था तक किशोरावस्था तक दंड दीजिए। लेकिन बालक जब बराबर का हो जाए तब उसे मित्रवत व्यवहार कीजिए। ऐसा नीतिकार लिखते हैं। उसके बाद आचार्य होता है दंड का अधिकारी। और आचार्य भी कब तक होता है? जब तक उसके नीचे अध्ययन करता है ब्रह्मचारी तब तक अध्ययन करता है तब तक दंड देता है। अच्छा ब्रह्मचारी निकल गया तब कौन दंड दे? तब अधिकारी होता है राजा। जोर से बोलो कौन होता है? और राजा है नहीं तो क्या करें? तो प्यारे बंधु राजा बनाया गया। सारे आचार्यों ने मिलकर बैठक की और उस समय जो सबसे बड़ा विद्वान आचार्य था उसको भारत का राजा बनाया गया। पूरे विश्व का राजा बनाया गया। उसका नाम है महाराज मनु। इस संसार का सबसे पहला राजा है महाराज मनु। आज महाराज मनु को लोग कुछ गलत बता रहे हैं।
लोग यह कह रहे हैं महाराज मनु दोषी है। महाराज मनु ने गलत काम किया। अरे वो लोग गलत है जो लोग महाराज मनु को गलत बता रहे हैं। अरे आप उस काल की मर्यादाओं को जाकर देखो। अरे महाराज मनु को थोड़ा सा पढ़ लेते तो महाराज मनु को दोषी नहीं बताते। क्या है महाराज मनु? महाराज मनु को पढ़ना है तो एक लघु पुस्तिका पढ़ लेना। उस पुस्तिका का नाम है मनु का विरोध क्यों? जोर से बोलो क्या नाम है? आप पढ़ लेना अंदाजा लग जाएगा। मेरे पास इतना अवकाश नहीं है कि मैं बहुत बात कर सकूं। सुनो महाराज मनु को राजा बना दिया गया। अच्छा क्या किया फिर इन्होंने? मैंने आपको अभी पूर्व वैदिक काल का दर्शन कराया। अब आप उत्तर वैदिक काल का दर्शन करो। उत्तर वैदिक काल में पूर्व वैदिक काल की सारी मर्यादाएं जो का त्यों है। शिक्षा भी वही है। पढ़ाने वाला भी वही है और आचार्य का सम्मान भी वही है। वही वर्ण व्यवस्था है। वही आश्रम व्यवस्था है।
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