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अधर्म का नाश किए बिना धर्म की जय नहीं होगी !

अधर्म का नाश किए बिना धर्म की जय नहीं होगी

भारत माता की जय। भारत माता की जय। भारत माता की जय। सबसे पहले भगवान महाकाल को प्रणाम करता हूं। इस पवित्र भूमि को प्रणाम करता हूं। अपने उन सभी पूर्वजों को प्रणाम करता हूं। जिन्होंने असंख्य यातनाएं झेली। जजिया दिया, टैक्स दिया। इसके बावजूद अपना उपाध्याय सरनेम नहीं छोड़ा, कन्वर्ट नहीं हुए और मुझे उपाध्याय बनाए रखा। उन सभी पूर्वजों को प्रणाम करता हूं जिसके कारण आप रघुनंदन शर्मा हैं। आप सुरेश पचौरी हैं। आप दवे हैं। आप अग्रवाल हैं। उन सभी पूर्वजों को प्रणाम करता हूं जो डरे नहीं जजिया देते रहे। जिसके कारण हमारी माताएं मंगलसूत्र पहनती हैं, सिंदूर पहनती हैं। हमारे सभी परिवार के लोग हाथों में रक्षा पहनते हैं।

कार्यक्रम आज है सुरक्षित भारत। यहां बुलाने के लिए बड़े भाई और क्या-क्या शब्द उपयोग करूं समझ में नहीं आ रहा। कहां गए? अच्छा सामने आपको प्रणाम करता हूं। आपने मुझे बुलाया। ऐसे लगता है कोई पूर्व जन्म का रिश्ता है। इसलिए मिलना कम होता है फिर भी एक दूसरे की याद आती रहती है। आदरणीय पचौरी साहब, दवे साहब, अग्रवाल साहब सामने बैठे उपस्थित सभी हमसे जो बड़े हैं, सबको मैं प्रणाम करता हूं। जो हमसे छोटे हैं सबको स्नेह भेंट करता हूं।

धर्म की जय हो। ऐसे थोड़ी जय होती है। धर्म की जय हो। अधर्म का नाश हो। प्राणियों में सद्भावना हो। विश्व का कल्याण हो। ये चार वाक्य पर्याप्त है भारत को सुरक्षित बनाने के लिए। अगर इसके हम निहितार्थ को समझ ले कि हमारे पूर्वजों ने चार वाक्य कहा क्या और इसमें बंटवारा किसका कैसे किया? पावर डिस्ट्रीब्यूशन किया कैसे? धर्म की जय करना समाज का काम है। हम लोग जो भी काम करते हैं गौशाला खोलते हैं, धर्मशाला खोलते हैं, लंगर लगाते हैं, ठीक है?

वेदशाला खोलते हैं, वैदिक शाला खोलते हैं, गुरुकुल खोलते हैं। इससे हम क्या करते हैं? जोर से बोलिए जरा धर्म की जय अधर्म का नाश हो ये अधर्म का नाश करना ये समाज की जिम्मेदारी नहीं थी भगवान परशुराम का अवतार किस लिए हुआ जोर से बोलिए जरा धर्म की जय अधर्म का नाश जोर से बोलिए जरा अधर्म का नाश भगवान राम का अवतार कथा पूजा करने के लिए हुआ !

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